जब वो छोटी बच्ची थी,

एक ख़ूबसूरत सी रात,

माँ उसे थपकी देकर सुला रही थी;

तभी उसकी नज़र अचानक चाँद पर जा टिकी;

और वो बोली, “माँ, मैं चाँद बनना चाहती हूँ!”

माँ ने समझाते हुए कहा,

“बेटा, तुम लड़की हो,

और यही नियति है कि तुम चाँद कभी नहीं बन सकतीं,

तुमको तो किसी चाँद की चाँदनी बनकर ही जीना होगा!”

“नहीं, माँ! मैं तो चाँद ही बनूँगी!

मेरी ख़ुद की रौशनी होगी!”

उसने भी जिद्द पकड़ ली!

उसकी रुलाई सुन, उसकी दादी दौड़ी हुई आयीं,

आखिर वो उनकी लाडली थी|

पर जैसे ही उनको सारी बात समझ में आई,

उन्होंने उससे हँसते हुआ कहा,

“नहीं बेटा! यह तो परम्परा है!

तुम चाँदनी ही बनोगी…

एक ख़ूबसूरत चाँदनी…अपने चाँद की प्यारी चाँदनी!”

उसने भी मन में ठान लिया,

बनेगी तो वो चाँद ही!

पर वो यह भी धीरे-धीरे समझ गयी

कि उसको यह ख़्वाहिश दिल के कोने में छुपाकर जीना होगा|

अब जब भी रात को सोते हुए वो चाँद देखती,

ख़ुशी से उसकी आँखों में रौशनी भर जाती,

उसकी साँसें तेज़ चलने लगतीं,

और उसके लब अकस्मात् ही मुस्कुरा उठते!

परम्पराओं की दीवारों को धकेलते हुए,

वो धीरे-धीरे अपनी जगह बनाती गयी|

कई प्रलय भरे काले तूफ़ान आये,

वो अपने ख़्वाबों की कश्ती लिए,

उसके सहारे उनसे टकराती रही|

कई बार शूलों ने उसके पैरों को छील रक्तरंजित कर दिया,

पर वो गुलों सी मुस्कुराती रही|

वक़्त उससे जंग खेलता रहा

और वो बिना रुके उससे भी आगे बढ़ती रही…

एक दिन देखा सबने

एक मकान की छत पर,

कोई रूह ज्योत सी जगमगा रही है!

सब उसके पास दौड़े-दौड़े आये-

किसी ने उसकी पीठ थपथपाई,

किसी ने उसे गले लगाया,

माँ और दादी ने उसके गाल पर चुम्बन अंकित कर दिया!

हाँ! वो चाँद बन गयी थी!

हाँ! उसके पास ख़ुद की रौशनी थी!

उस दिन, जब सबकी निगाह आसमान की ओर उठी,

तो सब ने देखा

दो चाँद चमक रहे हैं,

और यह देख

हर किसी ने दाँतों तले उँगली दबा ली!

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